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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 1


आ गया काल विकराल शान्ति के क्षय का,

निर्दिष्ट लग्न धरती पर खंड-प्रलय का.

हो चुकी पूर्ण योजना नियती की सारी,

कल ही होगा आरम्भ समर अति भारी.
कल जैसे ही पहली मरीचि फूटेगी,

रण में शर पर चढ़ महामृत्यु छूटेगी.

संहार मचेगा, तिमिर घोर छायेगा,

सारा समाज दृगवंचित हो जायेगा.
जन-जन स्वजनों के लिए कुटिल यम होगा,

परिजन, परिजन के हित कृतान्त-सम होगा.

कल से भाई, भाई के प्राण हरेंगे,

नर ही नर के शोणित में स्नान करेंगे.
सुध-बुध खो, बैठी हुई समर-चिंतन में,

कुंती व्याकुल हो उठी सोच कुछ मन में.

‘हे राम! नहीं क्या यह संयोग हटेगा?

सचमुच ही क्या कुंती का हृदय फटेगा?
‘एक ही गोद के लाल, कोख के भाई,

सत्य ही, लड़ेंगे हो, दो ओर लड़ाई?

सत्य ही, कर्ण अनुजों के प्राण हरेगा,

अथवा, अर्जुन के हाथों स्वयं मरेगा?
दो में जिसका उर फटे, फटूँगी मैं ही,

जिसकी भी गर्दन कटे, कटूँगी मैं ही,

पार्थ को कर्ण, या पार्थ कर्ण को मारे,

बरसेंगें किस पर मुझे छोड़ अंगारे?
चींताकुल उलझी हुई व्यथा में, मन से,

बाहर आई कुंती, कढ़ विदुर भवन से.

सामने तपन को देख, तनिक घबरा कर,

सितकेशी, संभ्रममयी चली सकुचा कर.
उड़ती वितर्क-धागे पर, चंग-सरीखी,

सुधियों की सहती चोट प्राण पर तीखी.

आशा-अभिलाषा-भारी, डरी, भरमायी,

कुंती ज्यों-त्यों जाह्नवी-तीर पर आयी.
दिनमणि पश्चिम की ओर क्षितिज के ऊपर,

थे घट उंड़ेलते खड़े कनक के भू पर.

लालिमा बहा अग-अग को नहलाते थे,

खुद भी लज्जा से लाल हुए जाते थे.
राधेय सांध्य-पूजन में ध्यान लगाये,

था खड़ा विमल जल में, युग बाहु उठाये.

तन में रवि का अप्रतिम तेज जगता था,

दीपक ललाट अपरार्क-सदृश लगता था.
मानो, युग-स्वर्णिम-शिखर-मूल में आकर,

हो बैठ गया सचमुच ही, सिमट विभाकर.

अथवा मस्तक पर अरुण देवता को ले,

हो खड़ा तीर पर गरुड़ पंख निज खोले.
या दो अर्चियाँ विशाल पुनीत अनल की,

हों सजा रही आरती विभा-मण्डल की,

अथवा अगाध कंचन में कहीं नहा कर,

मैनाक-शैल हो खड़ा बाहु फैला कर.
सुत की शोभा को देख मोद में फूली,

कुंती क्षण-भर को व्यथा-वेदना भूली.

भर कर ममता-पय से निष्पलक नयन को,

वह खड़ी सींचती रही पुत्र के तन को

रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 7


‘हाँ, पड़ पुत्र-प्रेम में आया था छल ही करने को,

जान-बूझ कर कवच और कुण्डल तुझसे हरने को,

वह छल हुआ प्रसिद्ध किसे, क्या मुख अब दिखलाऊंगा,

आया था बन विप्र, चोर बनकर वापस जाऊँगा.
‘वंदनीय तू कर्ण, देखकर तेज तिग्म अति तेरा,

काँप उठा था आते ही देवत्वपूर्ण मन मेरा.

किन्तु, अभी तो तुझे देख मन और डरा जाता है,

हृदय सिमटता हुआ आप-ही-आप मरा जाता है.
‘दीख रहा तू मुझे ज्योति के उज्ज्वल शैल अचल-सा,

कोटि-कोटि जन्मों के संचित महपुण्य के फल-सा.

त्रिभुवन में जिन अमित योगियों का प्रकाश जगता है,

उनके पूंजीभूत रूप-सा तू मुझको लगता है.
‘खड़े दीखते जगन्नियता पीछे तुझे गगन में,

बड़े प्रेम से लिए तुझे ज्योतिर्मय आलिंगन में.

दान, धर्म, अगणित व्रत-साधन, योग, यज्ञ, तप तेरे,

सब प्रकाश बन खड़े हुए हैं तुझे चतुर्दिक घेरे.
‘मही मग्न हो तुझे अंक में लेकर इठलाती है,

मस्तक सूंघ स्वत्व अपना यह कहकर जतलाती है.

‘इसने मेरे अमित मलिन पुत्रों का दुख मेटा है,

सूर्यपुत्र यह नहीं, कर्ण मुझ दुखिया का बेटा है.’
‘तू दानी, मैं कुटिल प्रवंचक, तू पवित्र, मैं पापी,

तू देकर भी सुखी और मैं लेकर भी परितापी.

तू पहुँचा है जहाँ कर्ण, देवत्व न जा सकता है,

इस महान पद को कोई मानव ही पा सकता है.
‘देख न सकता अधिक और मैं कर्ण, रूप यह तेरा,

काट रहा है मुझे जागकर पाप भयानक मेरा.

तेरे इस पावन स्वरूप में जितना ही पगता हूँ,

उतना ही मैं और अधिक बर्बर-समान लगता हूँ.
‘अतः कर्ण! कर कृपा यहाँ से मुझे तुरत जाने दो,

अपने इस दूर्द्धर्ष तेज से त्राण मुझे पाने दो.

मगर विदा देने के पहले एक कृपा यह कर दो,

मुझ निष्ठुर से भी कोई ले माँग सोच कर वर लो.
कहा कर्ण ने, ‘धन्य हुआ मैं आज सभी कुछ देकर,

देवराज! अब क्या होगा वरदान नया कुछ लेकर?

बस, आशिष दीजिए, धर्म मे मेरा भाव अचल हो,

वही छत्र हो, वही मुकुट हो, वही कवच-कुण्डल हो.
देवराज बोले कि, ‘कर्ण! यदि धर्म तुझे छोड़ेगा,

निज रक्षा के लिए नया सम्बन्ध कहाँ जोड़ेगा?

और धर्म को तू छोड़ेगा भला पुत्र! किस भय से?

अभी-अभी रक्खा जब इतना ऊपर उसे विजय से.
धर्म नहीं, मैने तुझसे से जो वस्तु हरण कर ली है,

छल से कर आघात तुझे जो निस्सहायता दी है.

उसे दूर या कम करने की है मुझको अभिलाषा,

पर, स्वेच्छा से नहीं पूजने देगा तू यह आशा.
‘तू माँगें कुछ नहीं, किन्तु मुझको अवश्य देना है,

मन का कठिन बोझ थोड़ा-सा हल्का कर लेना है.

ले अमोघ यह अस्त्र, काल को भी यह खा सकता है,

इसका कोई वार किसी पर विफल न जा सकता है.
‘एक बार ही मगर, काम तू इससे ले पायेगा,

फिर यह तुरत लौट कर मेरे पास चला जायेगा.

अतः वत्स! मत इसे चलाना कभी वृथा चंचल हो,

लेना काम तभी जब तुझको और न कोई बल हो.
‘दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाये,

देव और नर, दोनों ही, तेरा चरित्र अपनाये.’

दे अमोघ शर-दान सिधारे देवराज अम्बर को,

व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर गया कर्ण निज घर को

रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 6


‘भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का,

बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का,

पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ,

देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ.
‘यह लीजिए कर्ण का जीवन और जीत कुरूपति की,

कनक-रचित निःश्रेणि अनूपम निज सुत की उन्नति की.

हेतु पांडवों के भय का, परिणाम महाभारत का,

अंतिम मूल्य किसी दानी जीवन के दारुण व्रत का.
‘जीवन देकर जय खरीदना, जग मे यही चलन है,

विजय दान करता न प्राण को रख कर कोई जन है.

मगर, प्राण रखकर प्रण अपना आज पालता हूँ मैं,

पूर्णाहुति के लिए विजय का हवन डालता हूँ मैं.
‘देवराज! जीवन में आगे और कीर्ति क्या लूँगा?

इससे बढ़कर दान अनूपम भला किसे, क्या दूँगा?

अब जाकर कहिए कि ‘पुत्र! मैं वृथा नहीं आया हूँ,

अर्जुन! तेरे लिए कर्ण से विजय माँग लाया हूँ.’
‘एक विनय है और, आप लौटें जब अमर भुवन को,

दें दें यह सूचना सत्य के हित में, चतुरानन को,

‘उद्वेलित जिसके निमित्त पृथ्वीतल का जन-जन है,

कुरुक्षेत्र में अभी शुरू भी हुआ नही वह रण है.
‘दो वीरों ने किंतु, लिया कर, आपस में निपटारा,

हुआ जयी राधेय और अर्जुन इस रण मे हारा.’

यह कह, उठा कृपाण कर्ण ने त्वचा छील क्षण भर में,

कवच और कुण्डल उतार, धर दिया इंद्र के कर में.
चकित, भीत चहचहा उठे कुंजो में विहग बिचारे,

दिशा सन्न रह गयी देख यह दृश्य भीति के मारे.

सह न सके आघात, सूर्य छिप गये सरक कर घन में,

‘साधु-साधु!’ की गिरा मंद्र गूँजी गंभीर गगन में.
अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला,

देवराज का मुखमंडल पड़ गया ग्लानि से काला.

क्लिन्न कवच को लिए किसी चिंता में मगे हुए-से.

ज्यों-के-त्यों रह गये इंद्र जड़ता में ठगे हुए-से.
‘पाप हाथ से निकल मनुज के सिर पर जब छाता है,

तब सत्य ही, प्रदाह प्राण का सहा नही जाता है,

अहंकारवश इंद्र सरल नर को छलने आए थे,

नहीं त्याग के माहतेज-सम्मुख जलने आये थे.
किन्तु, विशिख जो लगा कर्ण की बलि का आन हृदय में,

बहुत काल तक इंद्र मौन रह गये मग्न विस्मय में.

झुका शीश आख़िर वे बोले, ‘अब क्या बात कहूँ मैं?

करके ऐसा पाप मूक भी कैसे, किन्तु रहूं मैं?
‘पुत्र! सत्य तूने पहचाना, मैं ही सुरपति हूँ,

पर सुरत्व को भूल निवेदित करता तुझे प्रणति हूँ,

देख लिया, जो कुछ देखा था कभी न अब तक भू पर,

आज तुला कर भी नीचे है मही, स्वर्ग है ऊपर.
‘क्या कह करूँ प्रबोध? जीभ काँपति, प्राण हिलते हैं,

माँगूँ क्षमादान, ऐसे तो शब्द नही मिलते हैं.

दे पावन पदधूलि कर्ण! दूसरी न मेरी गति है,

पहले भी थी भ्रमित, अभी भी फँसी भंवर में मति है
‘नहीं जानता था कि छद्म इतना संहारक होगा,

दान कवच-कुण्डल का – ऐसा हृदय-विदारक होगा.

मेरे मन का पाप मुझी पर बन कर धूम घिरेगा,

वज्र भेद कर तुझे, तुरत मुझ पर ही आन गिरेगा.
‘तेरे माहतेज के आगे मलिन हुआ जाता हूँ,

कर्ण! सत्य ही, आज स्वयं को बड़ा क्षुद्र पाता हूँ.

आह! खली थी कभी नहीं मुझको यों लघुता मेरी,

दानी! कहीं दिव्या है मुझसे आज छाँह भी तेरी.
‘तृण-सा विवश डूबता, उगता, बहता, उतराता हूँ,

शील-सिंधु की गहराई का पता नहीं पाता हूँ.

घूम रही मन-ही-मन लेकिन, मिलता नहीं किनारा,

हुई परीक्षा पूर्ण, सत्य ही नर जीता सुर हारा

रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 5


‘जनमा जाने कहाँ, पला, पद-दलित सूत के कुल में,

परिभव सहता रहा विफल प्रोत्साहन हित व्याकुल मैं,

द्रोणदेव से हो निराश वन में भृगुपति तक धाया

बड़ी भक्ति कि पर, बदले में शाप भयानक पाया.
‘और दान जिसके कारण ही हुआ ख्यात मैं जाग में,

आया है बन विघ्न सामने आज विजय के मग मे.

ब्रह्मा के हित उचित मुझे क्या इस प्रकार छलना था?

हवन डालते हुए यज्ञा मे मुझ को ही जलना था?
‘सबको मिली स्नेह की छाया, नयी-नयी सुविधाएँ,

नियति भेजती रही सदा, पर, मेरे हित विपदाएँ.

मन-ही-मन सोचता रहा हूँ, यह रहस्य भी क्या है?

खोज खोज घेरती मुझी को जाने क्यों विपदा है?
‘और कहें यदि पूर्व जन्म के पापों का यह फल है.

तो फिर विधि ने दिया मुझे क्यों कवच और कुंडल है?

समझ नहीं पड़ती विरंचि कि बड़ी जटिल है माया,

सब-कुछ पाकर भी मैने यह भाग्य-दोष क्यों पाया?
‘जिससे मिलता नहीं सिद्ध फल मुझे किसी भी व्रत का,

उल्टा हो जाता प्रभाव मुझपर आ धर्म सुगत का.

गंगा में ले जन्म, वारि गंगा का पी न सका मैं,

किये सदा सत्कर्म, छोड़ चिंता पर, जी न सका मैं.
‘जाने क्या मेरी रचना में था उद्देश्य प्रकृति का?

मुझे बना आगार शूरता का, करुणा का, धृति का,

देवोपम गुण सभी दान कर, जाने क्या करने को,

दिया भेज भू पर केवल बाधाओं से लड़ने को!
‘फिर कहता हूँ, नहीं व्यर्थ राधेय यहाँ आया है,

एक नया संदेश विश्व के हित वह भी लाया है.

स्यात, उसे भी नया पाठ मनुजों को सिखलाना है,

जीवन-जय के लिये कहीं कुछ करतब दिखलाना है.
‘वह करतब है यह कि शूर जो चाहे कर सकता है,

नियति-भाल पर पुरुष पाँव निज बल से धर सकता है.

वह करतब है यह कि शक्ति बसती न वंश या कुल में,

बसती है वह सदा वीर पुरुषों के वक्ष पृथुल में.
‘वह करतब है यह कि विश्व ही चाहे रिपु हो जाये,

दगा धर्म दे और पुण्य चाहे ज्वाला बरसाये.

पर, मनुष्य तब भी न कभी सत्पथ से टल सकता है,

बल से अंधड़ को धकेल वह आगे चल सकता है.
‘वह करतब है यह कि युद्ध मे मारो और मरो तुम,

पर कुपंथ में कभी जीत के लिये न पाँव धरो तुम.

वह करतब है यह कि सत्य-पथ पर चाहे कट जाओ,

विजय-तिलक के लिए करों मे कालिख पर, न लगाओ.
‘देवराज! छल, छद्म, स्वार्थ, कुछ भी न साथ लाया हूँ,

मैं केवल आदर्श, एक उनका बनने आया हूँ,

जिन्हें नही अवलम्ब दूसरा, छोड़ बाहु के बल को,

धर्म छोड़ भजते न कभी जो किसी लोभ से छल को.
‘मैं उनका आदर्श जिन्हें कुल का गौरव ताडेगा,

‘नीचवंशजन्मा’ कहकर जिनको जग धिक्कारेगा.

जो समाज के विषम वह्नि में चारों ओर जलेंगे,

पग-पग पर झेलते हुए बाधा निःसीम चलेंगे.
‘मैं उनका आदर्श, कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे,

पूछेगा जग; किंतु, पिता का नाम न बोल सकेंगे.

जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा,

मन में लिए उमंग जिन्हें चिर-काल कलपना होगा.
‘मैं उनका आदर्श, किंतु, जो तनिक न घबरायेंगे,

निज चरित्र-बल से समाज मे पद-विशिष्ट पायेंगे,

सिंहासन ही नहीं, स्वर्ग भी उन्हें देख नत होगा,

धर्म हेतु धन-धाम लुटा देना जिनका व्रत होगा.
‘श्रम से नही विमुख होंगे, जो दुख से नहीं डरेंगे,

सुख क लिए पाप से जो नर कभी न सन्धि करेंगे,

कर्ण-धर्म होगा धरती पर बलि से नहीं मुकरना,

जीना जिस अप्रतिम तेज से, उसी शान से मारना

सैरन्ध्री / मैथिलीशरण गुप्त / पृष्ठ 1


सुफल – दायिनी रहें राम-कर्षक की सीता;

आर्य-जनों की सुरुचि-सभ्यता-सिद्धि पुनिता।

फली धर्म-कृषि, जुती भर्म-भू शंका जिनसे,

वही एग हैं मिटे स्वजीवन – लंका जिनसे।

वे आप अहिंसा रूपिणी परम पुण्य की पूर्ति-सी,

अंकित हों अन्तःक्षेत्र में मर्यादा की मूर्ति-सी।

बुरे काम का कभी भला परिणाम न होगा,

पापी जन के लिए कहीं विश्राम न होगा।

अविचारी का काल भाल पर ही फिरता है,

कहीं सँभलता नहीं शील से जो गिरता है।

होते हैं कारण आप ही अविवेकी निज नाश में,

फँसते हैं कीचक सम स्वयं मनुजाधम यम-पाश में।

जब विराट के यहाँ वीर पाण्डव रहते थे,

छिपे हुए अज्ञात – वास – बाधा सहते थे।

एक बार तब देख द्रौपदी की शोभा अति –

उस पर मोहित हुआ नीच कीचक सेनापति।

यों प्रकट हुई उसकी दशा दृग्गोचर कर रूपवर,

होता अधीर ग्रीष्मार्त्त गज ज्यों पुष्करिणी देखकर।

यद्यपि दासी बनी, वस्त्र पहने साधारण,

मलिनवेश द्रौपदी किए रहती थी धारण।

वसन-वह्नि-सी तदपि छिपी रह सकी न शोभा,

उस दर्शक का चित्र और भी उस पर लोभा।

अति लिपटी भी शैवाल में कमल-कली है सोहती,

घन-सघन-घटा में भी घिरी चन्द्रकला मन मोहती।

छिपी हुई भी प्रकट रही मानो पांचाली,

छिप सकती थी कहाँ कान्ति कला निराली ?

वह अंगों की गठन और अनुपम अलकाली,

जा सकती थी कहाँ चाल उसकी मतवाली ?

काली काली आँखें बड़ी कानों से थीं लग रहीं,

गुण और रूप की ज्योतियाँ स्वाभाविक थीं जग रहीं।

सतियाँ पति के लिए सभी कुछ कर सकती हैं,

और अधिक क्या, मोद मान कर मर सकती हैं ।

नृप विराट की विदित सुदेष्णा थी जो रानी,

दासी उसकी बनी द्रौपदी परम सयानी ।

थी किन्तु देखने में स्वयं रानी की रानी वही,-

कीचक की, जिसको देख कर सुध-बुध सब जाती रही।

कीचक मूढ़, मदान्ध और अति अन्यायी था,

नृप का साला तथा सुदेष्णा का भाई था।

भट-मानी वह मत्स्यराज का था सेनानी,

गर्व-सहित था सदा किया करता मनमानी।

रहते थे स्वयं विराट भी उससे सदा सशंक-से,

कह सकते थे न विरुद्ध कुछ अधिकारी आतंक से।

तृप्त होकर रम्य रूप-रस की तृष्णा से,

बोला वह दुर्वृत्त एक दिन यों कृष्णा से –

“सैरन्ध्री, किस भाग्यशील की भार्या है तू ?

है तो दासी किन्तु गुणों से आर्या है तू !

मारा है स्मर ने शर मुझे तेरे इस भ्रू-चाप से !

अब कब तक तड़पूँगा भला विरह-जन्य सन्ताप से ?”

उसके ऐसे वचन श्रवण कर राजसदन में,

कृष्णा जलने लगी रोष से अपने मन में।

किन्तु समय को देख किसी विध धीरज धर के,

उससे कहने लगी शान्ति से शिक्षा कर के।

होता आवेश विशेष है यद्यपि मनोविकार में,

समयानुसार ही कार्य करते हैं संसार में।
सावधान हे वीर, न ऐसे वचन कहो तुम,

मन को रोको और संयमी बने रहो तुम।

है मेरा भी धर्म, उसे क्या खो सकती हूँ ?

अबला हूँ, मैं किन्तु न कुलटा हो सकती हूँ।

मां दीना हीना हूँ सही, किन्तु लोभ-लीना नहीं,

करके कुकर्म संसार में मुझको है जीना नहीं।

पर-नारी पर दृष्टि डालना योग्य नहीं है,

और किसी का भाग्य किसी को भोग्य नहीं है।

तुमको ऐसा उचित नहीं, यह निश्चय जानो,

निन्द्य कर्म से डरो, धर्म का भी भय मानो।

हैं देख रहे ऊपर अमर नीचे नर क्या कर रहे,

दुष्कृत में सुख है तो सुजन सुकृतों पर क्यों मर रहे ?

मेरे पति हैं पाँच देव अज्ञात निवासी,

तन-मन-धन से सदा उन्हीं की हूँ मैं दासी।

बड़े भाग्य से मिले मुझे ऐसे स्वामी हैं,

धर्म-रूप वे सदा धर्म के अनुगामी हैं।

इसलिए न छेड़ो तुम मुझे, सह न सकेंगे वे इसे,

श्रुत भीम पराक्रम-शील वे मार नहीं सकते किसे ?”

कीचक हँसने लगा और फिर उससे बोला –

“सैरन्ध्री, तेरा स्वभाव है सचमुच भोला।

तुझसे बढ़कर और पुण्य का फल क्या होगा,

जा सकता है यहीं स्वर्ग-सुख तुझसे भोगा।

भय रहने दे जय बोल तू, मेरा कीचक नाम है।

तेरे प्रभु-पंचक से मुझे चिन्त्य पंचशर काम है।

मैं तेरा हो चुका, तू न होगी क्या मेरी ?

पथ-प्रतीक्षा किया करूँगा कब तक तेरी ?

आज रात में दीप-शिखा-सी तू आ जाना,

दृष्टि-दान कर प्राण-दान का पुण्य कमाना।

जो मूर्ति हृदय में है बसी वही सामने हो खड़ी,

आ जावे झट-पट वह घड़ी यही लालसा है बड़ी।”

यह कहकर वह चला गया उस समय दम्भ से,

कृष्णा के पद हुए विपद-भय-जड़-स्तम्भ से !

जान पड़ा वह राजभवन गिरी-गुहा सरीखा,

उसमें भीषण हिंस्र-जन्तु-सा उसको दीखा।

वह चकित मृगी-सी रह गई आँखें, फाड़ बड़ी-बड़ी,

पर-कट पक्षिणी व्योम को देखे ज्यों भू पर पड़ी।

बड़ी देर तक खड़ी रही वह हिली न डोली,

फिर अचेत-सी अकस्मात चिल्लाकर बोली –

“है क्या कोई मुझे बचाओ, करो न देरी,

मैं अबला हूँ आज लाज लुट जाय न मेरी !

ऊपर नीचे कोई सुने मेरी यही पुकार है –

जिसको सद्धर्म-विचार है उस पर मेरा भार है।

हरे ! हरे ! गोविन्द, कृष्ण, तुम आज कहाँ हो ?

अथवा ऐसा ठौर कौन तुम नहीं जहाँ हो ?

रक्खी मेरी लाज तुम्हीं ने बीच सभा में,

हे अनन्त, पट तुम्हीं बने थे नीच-सभा में।

फिर आज विकट संकट पड़ा निकट पुकारूँ मैं किसे ?

यह अश्रु-वारि ही अर्घ्य है आओ अच्युत, लो इसे !”

भींगी कृष्णा इधर आँसुओं के पानी से,

कीचक ने यों कहा उधर जाकर रानी से –

“सैरन्ध्री-सी सखी कहाँ से तुमने पाई ?

बहन, बताओ कि यह कौन है, कैसे आई ?

देवी-सी दासी-रूप में दीख रही यह भामिनी।

बन गई तुम्हारी सेविका मेरे मन की स्वामिनी !”

सुन भाई की बात बहन ठिठकी, फिर बोली –

“ठहरो भैया, ठीक नहीं इस भाँति ठिठोली।

भाभी हैं क्या यहाँ चिढ़ें जो यह कहने से ?

और मोद हो तुम्हें विनोद-विषय रहने से !

अपमान किसी का जो करे वह विनोद भी है बुरा,

यह सुनकर ही होगी न क्या सैरन्ध्री क्षोभातुरा !

मैं भी उसको पूर्णरूप से नहीं जानती,

एक विलक्षण वधू मात्र हूँ उसे मानती।

सुनो, कहूँ कुछ हाल कि वह है कैसी नारी ?

उस दिन जब अवतीर्ण हुई, सन्ध्या सुकुमारी –

बैठी थी मैं विश्रान्ति से सहचरियों के संग में,

होता था वचन-विलास कुछ हास्य पूर्ण रस-रंग में।

वह सहसा आ खड़ी हुई मेरे प्रांगण में,

जय-लक्ष्मी प्रत्यक्ष खड़ी हो जैसे रण में !

वेश मलिन था किन्तु रूप आवेश भरा था।

था उद्देश्य अवश्य किन्तु आदेश भरा था।

मुख शान्त दिनान्त समान ही, निष्प्रभ किन्तु पवित्र था।

नभ के अस्फुट नक्षत्र-सा, हार्दिक भाव विचित्र था।

मुझ पर आदर दिखा रही थी, पर निर्भय थी,

अनुनय उसमें न था, सहज ही वह सविनय थी।

नेत्र बड़े थे, किन्तु दृष्टि भी सूक्ष्म बड़ी ही,

सबके मन में पैठ बैठ वह गई खड़ी ही !

वह हास्य बीच में ही रुका, सन्नाटा-सा छा गया,

मेरे गौरव में भी स्वयं कुछ घाटा-सा आ गया।

मुद्रा वह गम्भीर देख सब रुकी, जकी-सी

और दृष्टियाँ एकसाथ सब झुकी, थकी-सी।

काले काले बाल कन्धरा ढके खुले थे

गुँथे हुए-से व्याल मुक्ति के लिए तुले थे !

दृक् -पात न करती थी तनिक सौध विभव की ओर वह,

क्या कहूँ सौम्य या घोर थी कोमल थी कि कठोर वह !

सहसा मैं उठ खड़ी हुई उठ खड़ी हुई सब,

पर नीरव थी, भ्रान्त भाव में पडी हुई सब।

कया ससम्भ्रम प्रश्न अन्त में मैंने ऐसे –

भद्रे, तुम हो कौन ! और आई हो कैसे ?

उसके उत्तर के भाव का लक्ष्य न जाने था कहाँ –

मैं ? हाँ मैं अबला हूँ तथा आश्रयार्थ आई यहाँ।
इस पर निकला यही वचन तब मेरे मुख से –

अपना ही घर समझ यहाँ ठहरो तुम सुख से।

आश्रयार्थिनी नहीं असल में अतिथि बनी वह,

नहीं सेविका, किन्तु हुई मेरी स्वजनी वह।

अनुचरियों को साहस नहीं समझें उसे समान वे,

रह सकती नहीं किए बिना उसका आदर मान वे।

बहुधा अन्यमनस्क दिखाई पड़ती है वह,

मानो नीरव आप आप से लड़ती है वह !

करती करती काम अचानक रुक जाती है,

करके ग्रीवा-भंग झोंक से झुक जाती है !

बस भर सँभाल कर चित्त को श्रम से वह थकती नहीं,

पर भूल करे तो भर्त्सना मैं भी कर सकती नहीं।

कार्य-कुशलता देख-देख उसकी विस्मय से,

इच्छा होती है कि बड़ाई करे हृदय से।

किन्तु दीर्घ निश्वास उसे लेते विलोक कर,

रखना पड़ता मौन-भाव ही सहज शोक कर !

कुछ भेद पूछने से उसे होता मन में खेद है,

अति असन्तोष है पर उसे यांचा से निर्वेद है।

ऐसी ही दृढ़ जटिल चरित्रा है वह नारी,

दुखिया है, पर कौन कहे उसको बेचारी।

जब तब उसको देख भीति होती है मन में,

तो भी उस पर परम प्रीति होती है मन में।

अपना आदर मानो दया – करके वह स्वीकारती,

पर दया करो तो वह स्वयं, घृणा-भाव है धारती !

वृक्ष-भिन्न-सी लता तदपि उच्छिन्न नहीं वह,

मेरा सद्व्यवहार देखकर खिन्न नहीं वह।

जान सकी मैं यही बात उस गुणवाली की,

आली है वह विश्व-विदित उस पांचाली की।

जो पंच पाण्डवों की प्रिया प्रिय-समेत प्रच्छन्न है,

बस इसीलिए वह सुन्दरी सम्प्रति व्यग्र विपन्न है।